31 जुलाई 2025 को, मुंबई की National Investigation Agency की विशेष अदालत ने 2008 के मालेगांव बम धमाके के सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। इनमें पूर्व भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और नौकरीस्थ लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल हैं ।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने UAPA (Unlawful Activities (Prevention) Act) के तहत केस प्रस्तुत किया था, लेकिन दोनों sanction orders दोषपूर्ण थे, इसलिए UAPA लागू नहीं की जा सकती ।
कोर्ट ने forensic जांच में त्रुटियां, contaminated samples, मोटरसाइकिल (जिसमें विस्फोट हुआ) के चेसिस नंबर की अस्पष्टता, और प्रज्ञा ठाकुर की उस बाइक पर हस्तक्षेप की पुष्टि न होना जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों को रेखांकित किया ।
कुल प्रमाणों की संख्या 10,800 से अधिक, गवाहों की संख्या 323, और रिश्वत दलीलों की लंबाई 1,300 से अधिक पृष्ठों में बनी रही, लेकिन इन सबसे स्वतंत्र निष्कर्ष पर असर नहीं पड़ा — कोर्ट ने कहा कि ठोस या विश्वसनीय साक्ष्य नहीं मिले ।

भगवा आतंकवाद थ्योरी की ध्वस्तता…
इस मामले में हिन्दू चरमपंथ समूहों द्वारा योजनाबद्ध धमाके की थ्योरी, यानी “भगवा आतंकवाद“, का प्रचारथा,और कांग्रेस के कुछ नेताओं ने जैसे दिग्विजय सिंग, सुशील कुमार शिंदे, पी.चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद के झूठे नैरेटिव को गढने की पुरजोर कोशिश की जिसे मिडिया के ही एक खास समूह का भरपूर समर्थन भी मिला…
लेकिन अदालत ने पाया कि फैब्रिकेटेड, प्लांटेड और दबाव में बनाये गए सबूतों के आधार पर यह नैरेटिव स्थापित किया गया था,जिसकी पुष्टि कोर्ट द्वारा नहीं हुई। किसी भी ठोस प्रमाण से सिद्ध नहीं हो सका कि आरोपियों का इस तरह का कोई स्पष्ट साम्प्रदायिक साजिश थी ।
शिकायतकर्ता पक्ष—विशेष रूप से रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय—ने कोर्ट से पहले ही कहा था कि यह केस fabricated, yani रचा हुआ था, और गवाहों को डराकर बयान बदलवाए गए थे ।
इसमें प्रयुक्त सैद्धांतिक और राजनीतिक “थ्योरी” को अदालत ने प्रमाणित नहीं किया, जिससे ये मानना उचित है कि न्यायपालिका ने भगवा आतंकवाद का नैरेटिव ध्वस्त कर दिया है।
अदालत के निष्कर्ष… अभियोजन पक्ष ने प्रमाणित नहीं किया; UAPA लागू नहीं; सबूत असापेक्ष व विश्वसनीय नहीं।
थ्योरी की समीक्षा “भगवा आतंकवाद” थ्योरी पर आधारित आरोप असंगत और अदालत के मानदंडों के अनुरूपनहीं
राजनीतिक निहितार्थ यह निर्णय आगामी राजनीति, पत्रकारिता, मानवाधिकार बहस और न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
यह फैसला 17 वर्ष बाद आया जिसमें कई राजनीतिक, कानूनी और मीडिया बहसें चलीं, और अदालत द्वारा जांच एजेंसियों की क्षमता व निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए गए ।
कर्नल पुरोहित ने शिकायत की कि उन्होंने लगभग 9 वर्षों तक जेल में रखा, जहां उन्हें कथित रूप से टॉर्चर भी किया गया; अदालत ने उनकी मानवाधिकार एवं निष्पक्ष जांच की मांग पर ध्यान दिया ।
31 जुलाई 2025 को सुनाया गया यह फैसला, 2008 के मालेगांव धमाके को लेकर वर्षों से चले आ रहे “भगवाआतंकवाद” के नैरेटिव पर निर्णायक प्रहार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य न होते हुए थ्योरी पर आरोप लगाना न्यायिक दृष्टि से असंगत था। न्यायपालिका ने यह सुनिश्चित किया कि UAPA लागू न हो, और आरोपियों को निर्दोष करार दिया जाए।
यह केस साबित करता है कि राजनीतिक या मीडिया प्रचार में रचे गए कथानकों को न्यायालय ठोस साक्ष्यों की कसौटी पर खरा उतरने तक स्वीकार नहीं करता। यह फैसला कानूनी इतिहास में एक मिसाल बन गया—जहां थ्योरी ध्वस्त हुई, जबकि न्याय प्रक्रिया ने अपनी कार्यवाही और निष्पक्षता बनाए रखी।
अदालत के फैसले पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा है कि आतंकवाद भगवा न कभी था ,ना है और ना कभी रहेगा।

























