कल रात एक अजीब लेकिन विचार करने योग्य सपना आया। सपने में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वयं प्रकट हुए। खादी की धोती, हाथ में लाठी, चेहरे पर वही शांत मुस्कान… लेकिन इस बार उनके स्वर में हल्की सी व्यथा थी।

बापू बोले, “भाई, मैं पूरे वणी के बारे में जानना चाहता हूं। यहां किसकी जयंती मन रही है, किसकी पुण्यतिथि है, किसका स्वागत हो रहा है, किसकी नियुक्ति हुई है, कौन-सी उपलब्धि पर बधाई दी जा रही है… लेकिन मुझे कुछ दिखाई ही नहीं देता!”
कारण पूछा तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से बताया –
“नगर पालिका का जो बॅनर लगाने वाला ठेकेदार है, वह हर बार मेरा सर ढककर बॅनर लगा देता है। बॅनर मेरे पीछे लगता है… अब बताओ, मैं पीछे की दीवार कैसे पढ़ूं? मेरे पास मोबाइल भी नहीं है, न सोशल मीडिया अकाउंट। मैं अपडेट कैसे रहूं?”
गांधी चौक, जो वणी का मुख्य परिसर माना जाता है, जहां राष्ट्रपिता का पुतला वर्षों से खड़ा है — वही आज “बॅनर चौक” बनता जा रहा है। हर जयंती, हर पुण्यतिथि, हर स्वागत समारोह और हर राजनीतिक बधाई संदेश बापू के कंधों पर टिककर खड़ा हो जाता है।
बापू ने आगे कहा –
“मैं शिकायत नहीं कर रहा। मेरे पुतले पर धूल जमती है, आसपास कभी-कभी गंदगी रहती है, फिर भी मैं सबको माफ कर देता हूं। आखिर मैं इस देश का पिता हूं। लेकिन एक अभिभावक होने के नाते यह तो जानना मेरा अधिकार है कि मेरे शहर वणी में क्या घट रहा है।”

उन्होंने खासतौर पर नगर पालिका प्रशासन से, जिस पर हाल ही में भाजपा ने बहुमत के साथ अपना सिक्का जमाया है, हाथ जोड़कर विनती की –
“मेरे सर के पीछे बॅनर लगाना है तो लगाओ, मुझे कोई आपत्ति नहीं। लेकिन कृपा करके मेरे सामने भी दो बल्लियां गाड़ दो और एक बॅनर मेरी आंखों के सामने लगा दो। ताकि मैं पढ़ सकूं कि वणी में किसकी जयंती है, कौन-सा त्योहार आ रहा है, कौन किसे हार्दिक शुभकामनाएं दे रहा है।”
बापू ने मुस्कुराते हुए एक और कटाक्ष किया –
“वैसे भी बैनरों की वजह से मैं दिखाई तो देता नहीं हूं। अगर सामने भी बॅनर लग जाएगा तो किसी को क्या फर्क पड़ेगा कि बापू कहां गए? कम से कम मैं अपडेट तो रहूंगा!”
यह व्यंग्य भले ही एक सपने की कहानी हो, लेकिन सवाल हकीकत का है।
क्या गांधी चौक सिर्फ राजनीतिक और सामाजिक बधाई संदेशों का होर्डिंग स्टैंड बनकर रह गया है?

क्या राष्ट्रपिता का पुतला सिर्फ बैकग्राउंड सपोर्ट है, जिस पर हर कोई अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है?शहर के जिम्मेदारों को शायद यह सोचना होगा कि बापू को अपडेट रखने के लिए नहीं, बल्कि उनके सम्मान के लिए बैनर लगाने की परंपरा और स्थान पर पुनर्विचार जरूरी है।
क्योंकि अगर बापू सच में पूछ बैठें –
“वणी में क्या चल रहा है?”
तो जवाब देने के लिए सिर्फ बॅनर नहीं, साफ नीयत और साफ चौक भी चाहिए।

























