सुनिल तुगनायत, सिटी हब मीडिया वणी…
निर्गुडा की पुकार…
काश मेरी भी कोई जात होती,
कोई धर्म, कोई पहचान होती,
काश मैं भी वोटों की गिनती में आती,
तो शायद मेरी भी कुछ शान होती।

हर चुनाव में मेरे भी चर्चे होते,
नेताओं के मेरे तट पर फेरे होते,
वादों की बरसात मुझ पर होती,
अफसरों के भी यहाँ डेरे होते।

लेकिन मैं तो बस एक नदी हूँ,
सबकी प्यास बुझाने वाली,
खेतों को हरियाली देने वाली,
जीवन की ज्योति जलाने वाली।

मैंने कभी कुछ माँगा नहीं,
बस देती रही अपना नीर,
अपने आँचल में पाला सबको,
सहती रही हर घाव, हर पीर।
मेरे किनारे काट लिए गए,
मेरा सीना चीर दिया गया,
रेत के लोभ में मेरे तन को,
बार-बार अधीर किया गया।
मेरा घर उजाड़ दिया तुमने,
मेरी धड़कन रोक दी सारी,
फिर भी मैंने शिकायत न की,
न माँगी दुनिया से लाचारी।
आज मैं सूखी खड़ी हूँ देखो,
प्यासी मेरी हर एक लहर,
जिसने बरसों जीवन बाँटा,
वही खोज रही है अब जलधर।
न कोई नेता, न कोई नारा,
न कोई पूछे मेरी बात,
क्योंकि मैं वोट नहीं देती,
यही है मेरी सबसे बड़ी मात।
एक दिन जब मैं मिट जाऊँगी,
सूखेंगे खेत और गाँव सभी,
तब शायद तुम समझोगे आकर,
नदियाँ होती हैं माँ कभी।
तब मत कहना समय न था,
तब मत कहना खबर न थी,
निर्गुडा रोज़ पुकार रही थी,
बस सुनने वालों को फिक्र न थी।

























